Wednesday, 22 July 2015

*35/57-

सैनिक प्रशिक्षण के दौरान दोपहर के समय मैं एक सुनसान इलाके में छायादार वृक्ष के नीचे रुक कर राहगीरों को देख रहा था, तभी एक सुंदरी वहां से गुज़री और कांगड़ी में नीचे लिखी पक्तियां उभर आयीं।

वतें वतें जांदिये
ओ बांकिये मुट्यारे
दिले मोही लैंदे
तेरे कमरे दे हिलारे

तेरा लहंगा जाहलू
आसें पासें उड़दा
मन मुईए मेरा
दिखी दिखी डुलदा

तिरछियाँ नज़रां
कजो तू दिखदी
दिले'च नी जानी
सुई जेई चुभदी

वरसाती दा नालू
नी नित नित वेहन्दा
रंग रूप गौरिये
नी नित नित रेहन्दा

आ रुखे दिया छाउंआं
पल भर वही लैंदे
मन सलाह भगते दी
सुणी लैंदे कुछ कही लैंदे

(23/09/1976)

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