Sunday, 19 July 2015

07/56-

हमारे पहाड़ी नवयुवक चिरकाल से वाहर जाकर नौकरी करते आये हैं। चाहे फौज हो, चाहे मुम्बई में ड्राईवर की नौकरी,  आमतौर पर साल में एक ही वार घर आना होता था।  आर्थिक और परिबारिक कारणों से आज की तरह पत्नी और बच्चों को साथ रखना मुमकिन नहीं था। मैं 17 साल का था जव मैंने ये तुकबंदी की थी।

घड़ी मुड़ी तेरा चेता ओन्दा
दिल वेचारा रोई रोई पोंदा
कीहिंयां दस दिल लगाणा
मुइये मैं घुटी घुटी रौंदा

नैनां दी याद ठगी ठगी दिंदी
नी भुलदी तेरे मथे दी बिंदी
रही दूर दस किहियां निभणां
हथडुआं लवडुआं ते दूर रही नी हुँदा

कपडियां धोन्दी घडोलुयें पाणी भरोंदी
थकी थकी जांदी राती ढ़कोई ने सोंदी
किहिंया करि दस मैँ घरे जो औणा
साहव मौआ मेरा जली जली पोन्दा

खैर छोटे देरणूएं कने दिल लगाणा
चुपी चुपी रहणा वड़ा नी गलाणा
तौले ही मिली जाण असां
सुखना करनी कने धूप धुखाणा


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