Sunday, 19 July 2015

04/39+43+44-

कुछ कांगड़ी कहावतां. भाग-1-

1.     पंजां पां दियां पंज पकांदी
        ढाइयां सेरां दी इक,
        दाहडी जला पंज खांदा
        मैं वेचारी इक ।
(भावार्थ : किलो ग्राम से पहले भार तोलने की इकाई "सेर" हुआ करती थी और एक सेर में चार पाव। और क्षेत्रों का तो पता नहीं पर हमारे यहां सेर भी दो प्रकार के होते थे - कच्चा सेर और पक्का सेर। अढ़ाई कच्चे सेरों का एक पक्का सेर होता था। इस कहावत में एक चतुर औरत कह रही है की वह पांच पाव आटे कि पांच रोटियां वनाती है और अढ़ाई सेर की एक रोटी। दाडी जला पति पांच रोटी खाता है और बेचारी औरत केवल एक ही। सोचिये वेचारा कौन है औरत या उसका पति।)

2.     व्हरल बढ़ी डोई।

(भावार्थ : पुराने पहाड़ी घरों में कमरों पर छत डालने के लिए लकड़ी का एक मोटा सा, अक्सर चकोर, मज़बूत शहतीर डाला जाता था। उसको "व्हरल" कहते हैं। उस पर लकड़ी या बांस की कड़ियां डालकर लकड़ी के फट्टे या बांस के छछरे बिछा कर मिट्टी डाली जाती थी। "डोई" लकडी की कड़छी होती है। व्हरल का आकार वहुत वड़ा होता है और कड़छी उसकी तुलना में वहुत ही छोटी। जव कोई नोसिखिया अनाड़ी कारीगर या व्यक्ति वडी सी चीज वरवाद करके एक छोटी सी चीज वना देता है तो उस पर यह कहावत लागु होती है।)

3.     जलदी वुढी जली मरे
        असां तली सुहालु खाणा

(भावार्थ : कोई कुछ भी कर ले, हमने जो करना है करके रहेंगे।)

4.     कोआं रडांदे रहणा
        वडुआं पकी जाणां

(भावार्थ : विरोध होता रहेगा, काम करने वाले अपना काम कर जायेंगे।)


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