Sunday, 19 July 2015

03/36-

मेले

वणी ठणी जांदे थे।
मेले मेल मिलांदे थे।

'अज मेले जो जाणा है वो'
मंझलेयां पैंदलेयां जो हकां पाई
सनेहा भिजवान्दे थे।
मेले मेल मिलांदे थे।

छैल बांके रंग वरंगे कपड़े लते
टरंकुडुए ते कढ़ी करी
जुटकु जोड़े पंणियां पांदे थे।
मेले मेल मिलांदे थे।

मित्र मित्रनियां ने मिली करी
कुछ सुणनी कुछ सुणानी
सुख दुख अपु च बडांदे थे।
मेले मेल मिलांदे थे।

'ऊँगली पकड़ी रखेयां मुनुआ
गुआची वी जांदे हन',
वोल वड्डे वार वार सुनान्दे थे।
मेले मेल मिलांदे थे।

मंगेतर ईकी दूजे जो भालणे दा
मौका सनकां मारने दा
हथां ते नी गुआंदे थे।
मेले मेल मिलांदे थे।

विटियां-कुडियां जणासां
वंगा परांदू कज्जल विन्दी
निके-छुके खेलणु घरें लियांदे थे।
मेले मेल मिलांदे थे।

फोन फेसबुका दा झखड़  झुलेया
माहणु माहणुएँ जो मिलना भुलेया
पहलें तां झफियां खूब पांदे थे।
मेले मेल मिलांदे थे।



0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home